Showing posts with label शिव कुमार 'साहिल' ग़ज़ल. Show all posts
Showing posts with label शिव कुमार 'साहिल' ग़ज़ल. Show all posts

Sunday, July 4, 2010

शिव कुमार 'साहिल' की ग़ज़ल

पिछली ग़ज़ल थी श्री के.के.सिंह 'मयंक' की जो लखनऊ में रहते हैं, ये ग़ज़ल सर्वत साहब के माध्‍यम से मिली थी।

इस बार की ग़ज़ल प्राप्‍त हुई है शिव कुमार "साहिल " जी से जो हिमाचल प्रदेश के छोटे से गांव गुरुप्लाह, जिला - ऊना के निवासी हैं। कहते हैं कि अभी ग़ज़ल कि बारीकियों व तकनिकी पक्ष से नवाकिफ हैं, सीखने क़ी कोशिश में लगे हैं।

ग़ज़ल

वो कहानी मेरी सुनाता है
इस तरह गम को वो सुलाता है।

ढूंढता है मुझे अकेले में
जब मिले तो नज़र चुराता है

आ गया है उसे हुनर ये भी
मुस्‍कुराहट में ग़म छुपाता है।

भूल जाता हूँ खुद को मैं साकी
तू ये पानी में क्या मिलाता है।

जब कभी दिल जला तो आँखों से
गर्म पानी छलक ही जाता है।

कोई भी घर में अब नही रहता
बंद दर सब को ये बताता है

चाँद बैठा हुआ है पहरे पर
कौन तारे यहॉं चुराता है?

आपके सुझावों का स्‍वागत है।